कुम्भ महापर्व की परम्परा और महत्व

रविवार, फ़रवरी 07, 2016 0 Comments A+ a-

" कुम्भ महा पर्व " भारत प्राचीन परम्परा और गौरवमयी
वैदिक संस्कृति तथा सभ्यता का प्रतीक है। आदि शकराचार्य जी ने भी वैदिक काल से प्रचलित " कुम्भ महा पर्व " की परम्परा का उद्धार एवं प्रचार किया था। "कुम्भ" पर्व की यह परम्परा मनुष्य के द्वारा रत्न, ऐश्वर्य, सुख, आरोग्य और आत्म ज्ञान व अमरत्व की इच्छा से जुड़ी हुई हैं।

हमारे ऋषियों मुनियों ने सर्वश्रेष्ठ ' आत्म ज्ञान ' के अमरत्व को समझने या समझाने के लिए के किए " कुम्भ " रुपी सुन्दर प्रतीक को हमारे सामने प्रस्तुत किया या हमारे सम्मुख ररवा हैं।

अन्त: शुन्यो बहि: शुन्य: शु्न्य: कुम्भ इवाम्बरे ।
अन्त: पूर्णों बहि: पूर्ण: पूर्ण: कुम्भ इवार्णवे ।।


अर्थात् जिस प्रकार एक खाली " कुम्भ " आकाश में पड़ा हो, तो उसके अन्दर और बाहर सभी जगह आकाश ही आकाश रहता है, तथा जल से पूर्ण (भरा) " कुम्भ " समुद्र में डूबा हो, तो उसके अन्दर और बाहर जल ही जल रहता हैं, उसी प्रकार इस जगत के अन्दर बाहर सर्वत्र आत्मा ही है। कुम्भ पर्व आत्मा अौर आत्म ज्ञान सेे जुड़ा हुआ हैं ,
धर्म के मूल आधार पर ही समस्त मानव समाज प्रतिष्ठित है - " धर्मो विश्वस्य जगत : प्रतिष्ठा " । धर्म ही सम्पूर्ण जगत का आधार हैं, धर्म ने ही मानव समाज को बाँध रखा हैं जिसका मुल तत्व परमात्म तत्व हैं, इसी प्रकार सनातन धर्म का प्रतीक कुम्भ पर्व है। कुम्भ महा पर्व के अवसर पर पूरे विश्व के अनेक देशों से असंख्य श्रद्धालु और धर्मायण लोग एकत्र हो कर कुम्भ महा पर्व वाले स्थान पर (नासिक, हरिद्वार, प्रयाग और उज्जैन) स्नान, दान, तप आदि करके तथा वहाँ (कुम्भ महा पर्व वाले स्थान) पर रहने वाले और कुम्भ महा पर्व मनाने आये हुए संत, महात्माओं के अमृत रूपी प्रवचनों को सुनकर धन्य हो जाते हैं। वर्तमान समय में कुम्भ महा पर्व को कुम्भ मेला कहा जाने लगा हैं, मेला उसे कहते हैं जहाँ जन समुदाय एकत्र हो कर क्रय विक्रय, खेल तमाशे, नाटक, मनो विनोद और भोजन आदि करते हैं। परन्तु कुम्भ महापर्व का आयेजन हमारे धर्म शास्त्रों द्वारा इन बातों या इन कामों के लिए नही हुआ है। कुम्भ के साथ पर्व या महा पर्व कहने से ही सांस्कृतिक, धार्मिक या आध्यात्मिक भाव स्पष्ट होता हैं। प्राय: ऐसे धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजनाें का मुख्य उद्देश्य आत्म शुद्धि और आत्म कल्याण होता हैं ।


कुम्भ महा पर्व या कुम्भ पर्व अथवा अर्द्धकुम्भ पर्व में ऋषि, महर्षि, साधु, सन्त और विद्वानों का समागम राष्ट्र की ऐहिक तथा पारलौकिक व्यवस्था पर विचार विमर्श का कारण था, जिससे समाज में नवीन चेतना की प्राप्ति होती थी और देश, समय और वहाँ के वातावरण पर धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व का वर्चस्व स्थापित होता था ।
समय की दृष्ट्रि से ऐसे ग्रहयोग जो बम्हाण्ड में लुप्त और सुप्त अमृत्व को जागृत कर देते हैं, कालयोग (समय के योग) से 12 -12 वर्षों में चार स्थानो में ये प्रकट होते हैं । उस समय हरिद्वार (गंगा), प्रयाग (त्रिवेणी), उज्जैन (क्षिप्रा), नासिक (गोदावरी) में पतितपावनी नदियाँ अपनी जल धारा में अमृत तत्व को प्रवाहित करती हैँ अर्थात् देश, समय, वस्तु अौर वातावरण में अमृत का प्रादुर्भाव हो जाता हैं उसके फल स्वरुप अमृत घट या अमृत कुम्भ का अवतरण होता हैं। कलश (कुम्भ) के मुख में विष्णु , कष्ठ में रुद्र अौर मूल भाग में ब्रम्हा, मध्य भाग में मातृगण कुक्षि में समस्त समुद्र, पहाड़ और पृथ्वी रहते हैं तथा अंगों के सहित ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद रहतें हैं।
काल (समय) चक्र न केवल जीवन की क्रियाओं का मूल आधार हैं बल्कि समस्त यज्ञकर्म, अनुष्ठान अौर संस्कार भी काल (समय) चक्र पर आधारित हैं, काल (समय) चक्र में सूर्य, चन्द्र और देवगुरु बृहस्पति (गुरु) का महत्वपूर्ण स्थान हैं, इन तीन ग्रहों का योग ही कुम्भ महापर्व या कुम्भ पर्व का मुख्य आधार हैं।

कुम्भ पर्व क्यों मनाया जाता है ?


कुम्भ पर्व का प्रारम्भ कब से हुआ इसका ठीक प्रकार सें निर्णय कर पाना कठिन है क्योंकि वेदों में क़ुम्भ पर्व का आधार सुत्रों और मंत्रो में वर्णन हैं, जबकि पुराणों में चार प्रकार की कथाओं का उल्लेख मिलता हैं पहली भगवान शिव और गंगाजी की कथा, दुसरी महर्षि दुर्वासा की कथा तथा तीसरी कद्रु और विनता की कथा और चौथी समुद्र मंथन की कथा ये कथाएँ प्रसिद्ध हैं। इनमें सर्वाधिक प्रसिद्ध कथा समुद्र मंथन की कथा हैं। स्कन्ध पुराण की कथा मेंआता है कि एक बार विष्णु भगवान के निर्देश के अनुसार देवों और असुरों ने अमृत कुम्भ की प्राप्ति के लिए संयुक्त रूप से मिलकर क्षीरोद् सागर (क्षीर सागर ) में मंदराचल पर्वत और लासुकि नाग के द्वारा समुद्र मंथन किया जिससे पहले हलाहल (विष) उत्पन्न हुआ जिसे भगवान शिव जी ने पी लिया, हलाहल की ज्वाला के शांत होनें पर पुन: समुद्र मंथन प्रारम्भ हुआ जिससेे पुष्पक विमान, ऐरावत हाथी, पारिजात वृक्ष, नृत्य कला में पारंगत रम्भा, कौस्तुभ मणि, द्वितीया का बाल चन्द्रमा, कुण्डल, धनुष, कामधेनु, उच्चै: श्रवा, लक्ष्मी, धनवन्तर, विश्वकर्मा उत्पन्न हुए।

धनवन्तरी के हाथो मे कुम्भ शोभायमान हुआ,जो कि मुख तक अमृत से पूर्ण भरा हुआ था। विष्णु भगवान की कृपा से वह अमृत कुम्भ इन्द्र को प्राप्त हुआ, देवताओं के इशारे से इन्द्र पुत्र जयन्त अमृत कुम्भ को लेकर भागने लगे तब देत्यगण जयन्त का पीछा करने लगे। अमृत कुम्भ की प्राप्ति के लिए देवताओं और राक्षसों में दिव्य 12 दिनों (मनुष्यों के 12 वर्ष) तक भयंकर युद्ध हुआ, इस युद्ध में अमृत कुम्भ की रक्षा करते समय पृथ्वी पर जिन स्थानों पर अमृत की बुँदे गिरी, उन स्थानो (प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, नासिक) पर कुम्भ महा पर्व मनाया जाता हैं । मोहिनी रुप धारण कर विष्णु भगवान नें अमृत का भाग राक्षसों को न देकर देवताओं को पिला दिया जिससे देवगण अमर हो गए। पुराणों के अनुसार अमृत कुम्भ की रक्षा करने में बृहस्पति (गुरु) सूर्य और चन्द्रमा ने विशेष रूप से देवताओं की सहायता की थी। इस कारण सूर्य, चन्द्र और बृहस्पति (गुरू) ग्रहों के विशेष योग होने पर ही कुम्भ महा पर्व का आयोजन किया जाता हैं।

सिंहस्थ (कुम्भ) महापर्व और उज्जैन के सिंहस्थ का माहात्म्य


कल्प भेद से उज्जैन के दुसरे पौराणिक नाम अवन्तिका पुरी, महाकाल पुरी (महाकाल नगरी), उज्जयिनी, कुशस्थली, विशाला और अमरावती भी हैं। उज्जैन का नाम प्रत्येक युग में परिवर्तित होता रहता है, इसके सम्बन्ध में स्कन्ध पुराण में वर्णन आता हैं -

कल्पे कल्पे$खिलं विश्वं कालयेद्य : स्वलीलया ।
तं कालं कालयित्वा यो महा कालाे$भव त्किल ।।


इस वर्ष 21 मई शनिवार सन 2016 ई. (वैशाख पुर्णिमा) को अवन्तिका पुरी (उज्जैन) में क्षिप्रा नदी के किनारे पर कुम्भ महापर्व आयोजित होगा। शास्त्र के अनुसार जब वैशाख मास की पूर्णिमा के दिन गुरु सिंह राशि में हो, तो उज्जैन में कुम्भ महा पर्व का योग होता हैं -
मेषराशि गते सुर्ये सिंह राशिराशौ बृहस्पतौ ।
उज्जयिन्यां भवेतकुम्भ: सर्व सौख्य विवर्धन: ।।


स्कन्ध पुराण मे भी लिखा हैं -
माधवे धवले पक्षे सिंहे जीवे अजे रवौ । ।
तुला राशौ निशा नाथे पूर्णायां पूर्णिमातिथौ ।
उज्जयिन्यां तथा कुम्भ: योग जात: क्षमातले ।।


उपरोक्त ग्रह योग 21 मई शनिवार (वैशारवी पूर्णिमा ) को घटित हो रहा हैं, जिसके कारण उज्जैन में कुम्भ महा पर्व (सिंहस्थ) शाही स्नान का योग बन रहा हैं। मुख्य रूप से देव गुरू बृहस्पति (गुरू) के सिहं राशि के होने के समय ही यह कुम्भ महापर्व होता हैं, इस कारण इसे " सिंहस्थ महा पर्व " भी कहा जाता हैं।

उज्जैन को पृथ्वी का नाभि देश कहा गया हैं। द्वादश ज्योतिर्लिंगों मे महाकाल लिंग उज्जैन मे ही हैं और 51 शक्तिपीठों में उज्जैन में एक शक्तिपीठ भी है। द्वापर युग में श्री कृष्ण, बलराम भी उज्जैन के महर्षि सांदीपनि के आश्रम में विद्या अध्ययन करने के लिए आए थे। महाराज विक्रमादित्य के समय उज्जयिनी (उज्जैन) भारत की राजधानी थी। भारतीय ज्योतिष शास्त्र मे भी देशान्तर की शून्य रेखा उज्जैन से प्रारम्भ होना माना गया है। उज्जैन सप्तपुरियो मे से एक पुरी है। शिप्रा नदी पवित्र और पापहारिणी और सर्वत्र पुण्यदायिनी हैं, परन्तु अवन्ती पुरी (उज्जैन) में शिप्रा नदी का माहात्म्य और अधिक बढ जाता है, जो मनुष्य शिप्रा नदी में स्नान करके महेश्वर भगवान का पूजन करता है, वह महादेव जी और महादेवी जी की कृपा प्राप्त करके सम्पूर्ण मनोंकामनाओं की पूर्ति कर लेता हैं।

सिंहस्थ (कुम्भ) महापर्व की मुख्य स्नान तिथियाँ


(1) प्रथम स्नान - 13 अप्रेल बुधवार 2016 ईं. (चैत्र मास शुक्ल पक्ष, सप्तमी) से उज्जैन में कुम्भ महा पर्व का प्रथम स्नान और कुम्भ महा पर्व के स्नान दान जप अनुष्ठान आदि पुण्य लाभ प्राप्त करने का सु अवसर प्रात: ब्रह्म मुहुर्त से प्रारम्भ हो जाएगा।

(2) द्वितीय स्नान - 17 अप्रेल रविवार 2016 ई. (चैत्र मास शुक्लपक्ष एकादशी तिथि) को पुण्य लाभ का समय प्रात: 4/38 बजे से प्रारम्भ होकर प्रात : 06/08 बजे तक रहेगा, कुम्भ महा पर्व के तीर्थ स्नान सुर्योदय से पहले अरूणोदय में करने' का शास्त्रों में वर्णन हैं, जाप, पाठ दान आदि सुर्योदय के बाद भी कर सकते हैं।

(3) तृतीय स्नान - 22 अप्रेल शुक्रवार 2016 ई. (चैत्र मास शुक्ल पक्ष पूर्णिमा तिथी) को स्नान दान आदि के पूण्यलाभ प्राप्त करने का समय प्रात: 04/35 बजे से प्रारम्भ हो जाएगा अौर सुर्योदय तक रहेगा। पूजा, पाठ, दान आदि सुर्योदय के बाद भी कर सकते है।

(4) चतुर्थ स्नान - 3 मई मंगलवार 2016 ई. (वैशाख मास कृष्ण पक्ष वरूथिनी एकादशी तिथि) को स्नान, ध्यान, जाप, पाठ और दान आदि के पुण्य लाभ प्राप्त करने का समय प्रात: 04/31 बजे से प्रारम्भ होकर प्रात: 05/58 बजे तक रहेगा, जाप, पाठ दान आदि सुर्योदय के बाद भी कर सकते हैं।

(5) पंचम स्नान - 6 मई शुकवार 2016 ई. (वैशाख मास कृष्ण पक्ष अमावस्या तिथि) को स्नान, ध्यान, दान आदि के पुण्य लाभ प्राप्त करने का समम प्रात: 04 /29 बजे से प्रात: 05 /56 बजे तक रहेगा, पूजा,पाठ ,ध्यान , जाप और दान आदि सुर्योदय के बाद भी कर सकते हैं।

(6) षष्ठ स्नान - 9 मई सोमवार 2016 ई. ( वैशाख मास शुक्ल पक्ष तृतीया तिथी) को स्नान ,ध्यान , जाप , पाठऔर दान आदि का पुण्य लाभ प्राप्त करने का समय पात : 04/27 बजे से प्रारम्भ होकर प्रात : 05/54 बजे तक रहेगा, पूजापाठ, जाप और दान सुर्योदय के बाद भी का सकते हैं।

(7) सप्तम स्नान - 11 मई बुधवार 2016 ई. (वैशाख मास शुक्ल पक्ष पंचमी तिथी) को स्नान, ध्यान, जाप, पाठ अौर दान आदि का पूण्य लाभ प्राप्त करने का समय प्रात: 04/26 से प्रारम्भ होकर प्रात: 05/53 बजे तक रहेगा, पूजा, पाठ, जाप और दान आदि सुर्योदय के बाद भी कर सकते हैं, यह तिथि आद्य गुरु स्वामी शंकराचार्य जी की अवतरण तिथि हैं।

(8) अष्टम स्नान - 17 मई मंगलवार 2016 ई. ( वैशाख मास शुक्ल पक्ष एकादशी तिथि) को स्नान, ध्यान, जाप, दान आदि का पुण्य लाभ प्राप्त करने का समय प्रात: 04/24 बजे से प्राम्भ होकर प्रात: 5/51 बजे तक रहेगा। पूजा, पाठ, जाप और दान आदि सुर्योदय के बाद भी कर सकते हैं।

(9) नवम (शाही स्नान) स्नान - 21 मई शनिवार 2016 ई. (वैशाख मास शुक्ल पक्ष पूर्णिमा तिथि) इस दिन स्नान, ध्यान, जाप, पूजा, पाठ और दान आदि का पुण्य लाभ पाप्त करने का विशेष मु्हर्त प्रात: 04/21 बजे से प्रारम्भ होगा जो सुर्योदय तक रहेगा, शाही स्नान वाले दिन उज्जैन में सुर्योदय प्रात: 5/48 बजे होगा, जो भक्त विशेष मुहुर्त में स्नान नही कर पाए वे सुर्योदय के समय स्नान कर पूजा, पाठ जाप ध्यान और दान आदि करके शाही स्नान के पुण्य लाभ को प्राप्त करें।

यदि उपरोक्त (उपर बताए गए) समय में भीड़ आदि या किसी अन्य कारणों से आपका कुम्भ महापर्व का स्नानसम्भव नही हो, तो सुर्यास्त पर्यन्त जब समय हो तब स्नान ध्यान पूजा पाठ जाप दान आदि कर लेना चाहिए, क्योंकि कुम्भ महा पर्व का माहात्म्य तो कुम्भस्नान वाले दिन स्नान मुर्हुत के बाद भी पुरा दिन तक रहता हैं।

शाही स्नान वाले दिन विभिन्न अरवाडों और साधु सन्त महात्माओं की शाही शोभा यात्राएँ निकलेगी, उज्जैन के सिंहस्थ (कुम्भ) महापर्व में एक ही बार शाही स्नान होता हैं।

कुम्भ महापर्व पर स्नान दान का माहात्म्य


हमारे धर्म शास्त्रोँ में हरिद्वार, प्रयाग, नासिक, उज्जैन तीर्थों में कुम्भ स्नान, दान, जाप, पूजा, ध्यान और यज्ञ आदि अनुष्ठान करने का विशेष महत्व कहा गया है। हजाराे अश्वमेंघ यज्ञ करने से या सेकड़ों वाजपेय यज्ञ करने से अथवा लाख बार पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करने से जो पुण्य लाभ प्राप्त होते है वह सभी पुण्य फल कुम्भ स्नान करने से प्राप्त हो जाते है -

अशिमेध सहस्राणि वाजपेय शतानि च।
लक्षं प्रदक्षिणा भूमे : कुम्भ स्नानेन हि तत्फलम् ।।


स्नान करनें के बाद संध्या, तर्पण आदि के बाद गणेश अम्बिका आदि देवताओं के पूजन सहित कुम्भ (कलश) को स्थापित करें और श्रद्धा, भक्ति के साथ स्थापित कुम्भ का षोड़शोपचार (सोलह उपचार से) से पूजन करनें के बाद एक, चार, ग्यारह यथाशक्ति सोने, चाँदी, ताँबा, पीतल के कुम्भों (कलशों) में शुद्ध घी भरकर वस्त्र, मिष्ठान्न, गुड़, फल आदि सहित दक्षिणा लेकर संकल्प के द्वारा किसी योग्य विद्वान ब्राम्हण को दान करना चाहिए।

कुम्भ पर्व पर विधि पूर्वक.शुद्ध घी से पूरा भरा कुम्भ (कलश) का पूजन करके उसे वस्त्र, अलंकार, मिष्ठान्न, फल आदि दक्षिणा सहित संकल्प के साथ किसी योग्य ब्राम्हण (एक से अधिक कुम्भ हो, तो कराम्हणाें को) को दान करने से सेकड़ों गौ दान करने का पुण्य लाभ मिलता हैं।

कुम्भ पर्व पर साधु , सन्तों , महात्माओं को भोजन कराकर यथा शक्ति दक्षिणा आदि दान करनें से आत्म कल्याण के साथ साथ पितरों की आत्मा की तृप्ति होती है।

अर्ध कुम्भ या कुम्भ पर्व व्यक्ति के जन जीवन की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक चेतना विंभिन्न आयामों के संगम का प्रतीक हैं, जिसमें विश्व के अनेक धर्म गुरुओं, सिद्ध महा पुरुषों, सिद्ध महात्माओं और धर्म परायण श्रद्धालुओं का समागम होता हैं। जो मनुष्य कुम्भ स्नान की महापुण्य बेला पर कुम्भपर्व वाले स्थान के स्नान के घाट पर घाट के जल में खड़े होकर " ऊँ नम : शिवायै गंगायै शिवायै नमो नम: । नमस्ते विष्णु रुपिण्यै बम्ह मुर्त्यै नमो$स्तुते।। " मंत्र का जाप करता है और जाप के बाद गंगा स्तोत्र , शिव स्तोत्र आदि का पाठ करता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है।